आज पूंजीपति वर्ग के विद्वान भारत की शासन करने की एक प्रणाली जनतंत्र को एक आदर्श व्यवस्था की तरह पेश करते हैं। इसके इन प्रचारकों द्वारा कहा जाता है कि यह ” जनता द्वारा, जनता की, जनता के लिए” सरकार है, कि इसमें जनता स्वयं ही अपनी सरकार है क्योंकि वही सरकार को चुनती है और जरूरत पड़ने पर अगले चुनाव में से बदल देती है। भला इससे बेहतर क्या होगा कि जनता खुद ही अपनी सरकार चुने और जरूरत पड़ने पर इसे बदल दे?
पूंजीवादी प्रचारक जनतंत्र के बदले कम्युनिज्म को रखते हैं और कहते हैं कि कम्युनिज्म में जनता के पास कोई अधिकार नहीं होते। उसमें एक पार्टी की तानाशाही होती है। इस तरह जनतंत्र बनाम कम्युनिज्म के मामले में कोई भी व्यक्ति स्वतः ही जनतंत्र को चुनेगा।
यहां पूंजीवादी विचारक बहुत भोलेपन या चालाकी के साथ, जाने-अनजाने पूंजीपति वर्ग की शासन करने की एक प्रणाली के मुकाबले एक समाज व्यवस्था को ही रख देते हैं। वह इस बात को जाने-अनजाने छुपाते हैं कि पूंजीपति वर्ग की सामाजिक व्यवस्था यानी पूंजीवाद में शासन करने की कई प्रणालियों हो सकती हैं। संवैधानिक राजतंत्र, पूंजीवादी जनतंत्र , एक व्यक्ति की तानाशाही, एक पार्टी की तानाशाही, सैनिक तानाशाही इत्यादि। जिसे पूंजीपति जनतंत्र कहता है वह इनमें से एक है, यानि पूंजीवादी जनतंत्र।
दूसरी ओर कम्युनिज्म भविष्य की एक ऐसी समाज व्यवस्था है, जिसमें किसी तरह का शासन नहीं होगा, एक पार्टी के तानाशाही तो क्या वहां शासन ही नहीं होगा, राज्य सत्ता ही नहीं होगी। पूरा समाज स्वतंत्र, संगठित और संचालित होगा क्योंकि उस समय में कोई शोषण और शोषित नहीं होगा इसलिए वहां कोई शासन और कोई शासित भी नहीं होगा।
इस तरह देखें तो जनतंत्र बनाम कम्युनिज्म का पूंजीवादी प्रचार एक घृणित झूठ है, और अपने जनतंत्र यानि पूंजीवादी जनतंत्र के असली चरित्र को छुपाने की साजिश है। आज का पूंजीवादी समाज जो पूंजीपति वर्ग द्वारा शोषण और शासन पर टिका है वह एक झटके से शोषण विहीन, शासन विहीन कम्युनिस्ट समाज में नहीं पहुंच जाएगा। इन दोनों के बीच भी एक समाज होगा, इसे समाजवादी समाज का नाम दिया गया है।
समाजवादी समाज में जो शासन होगा, वह समाजवादी जनतंत्र के नाम से जाना जाता है। इस तरह पूंजीवादी जनतंत्र का विपरीत ध्रुव वस्तुतः समाजवादी जनतंत्र है। इन दोनों का ही चरित्र क्या है? इन दोनों में कौन शासन करता है, और किस पर शासन किया जाता है तथा इस शासन का लक्ष्य क्या है? यही इस लेख का विषय है।
पूंजीवादी जनतंत्र का क्रमशः ऐतिहासिक विकास कैसे हुआ, इस पर विस्तार से फिर कभी। अभी तो इतना ही जिक्र काफी है कि सामंतवाद में उभरते पूंजीपति वर्ग की बढ़ती ताकत के अनुरूप उन्हें शासन की नई प्रणाली की जरूरत हुई। इसी के लिए पूंजीपति वर्ग के विचारक भी पैदा हुए। इन विचारकों ने कहा कि शासन सत्ता में कोई सार्वभौम, सर्वसत्तासम्न्न राजा या सामंत नहीं हो सकता। वह सारी राज्यसत्ता का आधार नहीं हो सकता।
कहा गया कि सारी सत्ता एक दूसरे के सर्वथा बराबर नागरिकों में निहित है। सारे नागरिक मिलकर ही सत्ता का आधार बनते हैं। कोई भी शासन इन्हीं नागरिकों के आधार पर खड़ा होना चाहिए। अब जब सारे नागरिक बराबर हैं तो व्यवहार में उनमें से कोई एक दूसरे पर शासन नहीं कर सकता। ऐसे में एक ही तरीका बचता है। सारे नागरिक मिलकर अपने बीच से कुछ लोगों को चुनें जो नागरिकों की ओर से नागरिकों पर शासन करें। यहीं से पूंजीवादी जनतंत्र की शुरुआत हुई।
सामंतवाद में राजा का बेटा राजा, और किसान का बेटा किसान होता था, लेकिन पूंजीवादी जनतंत्र में शासन चुनाव के जरिए तय होता है। इसलिए वह शासक पैदाइशी नहीं हो सकता। लेकिन देखा गया कि पूंजीपति वर्ग ने राजाओं, सामंतों की सत्ता से भयंकर संघर्ष के बाद भी उसे उखाड़ फेंकने के बदले उनसे समझौता कर लिया। उन्होंने पुरानी सत्ता को सुधार कर उसमें बस अपने लिए जगह हासिल कर ली। पुराने निरंकुश राजतंत्र को अब संवैधानिक राजतंत्र में बदल दिया गया।
अब राजा मन से नहीं चल सकता था। उसे भी संविधान-कानून के हिसाब से चलना होता था। कानून बनाने के लिए सांसदों का गठन हुआ, जिसमें सामंतों के साथ पूंजीपतियों के भी नुमाइंदे होते थे। ज्यादातर जगहों पर यही हुआ। केवल फ्रांस जैसे देशों में ही जहां सामंतों ने झुकने और समझौता करने से इनकार किया, सामंतों को उखाड़ फेंकने वाली ” फ्रांसीसी क्रांति ” हुई। लेकिन फ्रांस में सामंतों का पूर्णतया सफाया करने में सौ साल लग गए और इसके लिए चार क्रांतियों की आवश्यकता हुई।
दूसरी बात यह है कि पूंजीपति वर्ग ने नागरिकों के अधिकार को केवल एक थोड़े से संपत्ति वाले हिस्से तक सीमित कर दिया। ज्यादातर वयस्क आबादी (किसान, मजदूर, महिलाएं) नागरिक अधिकारों से वंचित रहे। यह इंग्लैंड जैसे संवैधानिक राजतंत्र वाले देशों में ही नहीं था, यह फ्रांस और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे गणतंत्र में भी था। मानव और नागरिकों के अधिकारों की घोषणा मजदूरों, किसानों, स्त्रियों और गुलामों पर लागू नहीं होती थी। यानि करीब अस्सी या नब्बे प्रतिशत आबादी नागरिक नहीं मानी जाती थी, उन्हें शासन में अधिकार के लायक ही नहीं समझा जाता था। कहा जाता था कि यदि अनपढ़ और जाहिल लोग शासन करेंगे तो सब चौपट हो जाएगा।
असल में तब पूंजीवादी जनतंत्र खुले रूप में पूंजीपति वर्ग और अन्य संपत्तिवानों तक सिमटा था और वे इस बात से भयभीत थे कि संपत्तिविहीन नागरिकों तक नागरिकता का विस्तार होने से उनका शासन छिन्न-भिन्न हो जाएगा और वह अपने जनतंत्र को जन्म से ही आम नागरिकों से दूर रखने के लिए कटिबद्ध थे। स्वयं भारत की संविधान सभा के चार सौ के करीब सदस्यों का चयन ही आबादी के मात्र दसवें हिस्से के वोटों से हुआ था। कमाल है न? “हम भारत के लोग…अध्यर्पित करते हैं।”
खैर, पुनः इधर आएं।मजदूर वर्ग और अन्य गरीब आबादी साथ ही स्त्रियों ने भी नागरिक अधिकार हासिल करने के लिए करीब सौ सालों तक भीषण संघर्ष किया और सारे पूंजीपति वर्ग को कदम दर कदम पीछे धकेला। इसमें तेजी तब आई जब 1917 में रूस में बोल्शेविक क्रांति हुई और (नब्बे प्रतिशत) मजदूर वर्ग का शासन हो गया, रूप में भले ही ” सर्वहारा की तानाशाही ” परंतु अंतर्वस्तु थी, अधिकतम संभव लोकतंत्र। मजदूर वर्ग की समाजवादी सरकार ने अपने सभी वयस्क लोगों को नागरिकता के अधिकार दे दिए। चुनने और चुने जाने के अधिकार वाली मजदूर वर्ग की इस क्रांति के दबाव में पूंजीपति वर्ग को भी अपने सभी वयस्क लोगों को दिल पर पत्थर रखकर नागरिक अधिकार देने पड़े।
पूंजीवादी देशों में साम्राज्य देशों में भी यह प्रक्रिया 1970 के दशक तक चलती रही। इस तरह आज जब पूंजीवादी प्रचारक जनतंत्र का गुणगान करते हैं तो वह झूठ बोल रहे होते हैं। वे इस बात को छुपा ले जाते हैं कि यह जनतंत्र पूंजीपति वर्ग की देन नहीं है बल्कि मजदूर मेहनतकश आबादी ने प्रथमतः तो मजदूर वर्ग ने यह अधिकार पूंजीपति वर्ग से भीषण संघर्ष कर हासिल किया है। पूँजीपति वर्ग का बस चलता तो वह इसे अभी भी थोड़े से संपत्तिवानों तक सीमित रखना चाहता।
वास्तव में तो वह अभी भी ऐसा प्रयास करता और कामयाब होता है। औपचारिक रूप से सभी वयस्क लोगों का शासन होने के बावजूद असल में यह थोड़े से संपत्तिवानों का राज है। इसी में आज के पूंजीवादी जनतंत्र का असली चरित्र निहित है।औपचारिक रूप से जनता द्वारा जनता का जनता के लिए शासन होने के बावजूद यह असल में, अपनी अंतर्वस्तु में पूंजीपति वर्ग की तानाशाही है। वोट तो देता है मजदूर वर्ग और बाकी मेहनतकश जनता, लेकिन शासन करते हैं पूंजीपति वर्ग और उसके विचारक। सारी वयस्क आबादी के सार्वजनिक मताधिकार से इससे ज्यादा कुछ हासिल नहीं होता, यह गुरु लेनिन राज्य और क्रांति में साफ बोल रहे हैं।
इस अधिकार के विस्तार से भी पूंजीपति भयभीत थे। लेकिन उन्होंने देखा कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। उनके वर्ग का शासन उसी तरह कायम रहा जैसे पहले था, बल्कि यह पाया गया कि पूंजीपति वर्ग के लिए शासन करने का यह तो सबसे अच्छा रूप है। अब इस नाटक में मजदूर वर्ग और गरीब आदमी को भी लगने लगा कि यह उसी की चुनी हुई जनता की सरकार है। दरअसल इसमें पूंजीपति वर्ग का वास्तविक शासन जनता की आंखों से ओझल ही रहता है।
जब मजदूर मेहनतकश जनता अपने कड़वे अनुभव से देखती है कि उसकी जिंदगी में तो कोई बेहतरी नहीं हो रही है या वह और खराब हो रही है तब या तो वह पूंजीवादी पार्टियों की अदला बदली कर रह जाता है , यानि साँपनाथों की जगह नागनाथों को ले आता है। इतना मात्र कर संतुष्ट हो जाता है या फिर पूंजीवादी चुनाव प्रक्रिया से ही भरोसा उठ जाता है। इसके लिए भी पूंजीपति वर्ग ने चालीस साल से नोटा का झुनझुना पकड़ाया है।
लेनिन ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ “राज्य और क्रांति ” में जिक्र किया है कि सर्व मताधिकार प्राप्त समाज में किन्हीं भी पार्टियों और उसके नेताओं की अदला-बदली से भी पूंजीवादी राज्य सत्ता पर पूंजीपति वर्ग के नियंत्रण पर रंचमात्र भी फर्क नहीं पड़ता। इस तरह पूंजीवादी जनतंत्र का वास्तविक सार तत्व यह है कि इसमें जनता को समय-समय पर यह अधिकार दिया जाता है कि वह यह चुने कि अब से अगले चुनाव तक कौन उस पर हुकुम चलाएगा, कौन उसका दमन करेगा। एक उदाहरण पेश है। जापानी पूंजीपति ओसामु सुजुकी के मालिकाने वाले मारुति के 18 जुलाई 2012 के आंदोलन को देख लिया जाए जब हरियाणा में कांग्रेस सरकार थी तो मजदूरों पर बुरी तरह दमन किया गया। अपराध था एक ईमानदार यूनियन का गठन, जिसका वादा पूंजीवादी संविधान करता है। कांग्रेसी सुप्रीम वकील केटीएस तुलसी को प्रत्येक पेशी पर ₹9 लाख रुपए ओसामु ने नहीं ख़ुद उसकी सेवक कांग्रेस सरकार ने दिए और टाइपिस्ट को ₹ एक लाख रुपए प्रतिदिन दिए गए।
कुल 9 करोड रुपए खर्च हुए जिसकी जांच करने का भाजपा ने भरोसा दिया था लेकिन भाजपा जब हरियाणा में सत्ता में आई तो क्या हुआ? क्या होना था? कुछ भी नहीं। वो तो और भी बड़े सेवक हैं, फासिस्ट सरकार का सबसे बड़ा गुण बल्कि पूंजीपतियों के अनन्य भक्त हैं, जन्म ही तभी हुआ है।
खैर, पूंजीवादी जनतंत्र में यह गोरखधंधा कैसे संपन्न किया जाता है यह देखें। इसमें एक तो चुने हुए प्रतिनिधियों की भ्रष्ट किए जाने से, पूंजीपति वर्ग द्वारा उन्हें खरीद लिए जाने से, दूसरे वास्तविक शासन को चुने हुए प्रतिनिधियों और चुनी हुई संस्थाओं से भी अलग करके यह होता है।
सामंती वर्ग के मुकाबले पूंजीपति वर्ग इस मायने में भिन्न होता है कि वह आमतौर पर खुद शासन नहीं करता। इसके बदले पेशेवर राजनीतिज्ञ और नौकरशाह उसकी ओर से शासन चलाते हैं। उनकी भर्ती गैर पूंजीवादी संपत्तिवान वर्गों से खासकर मध्यम वर्ग से होती है। ज्यादातर पूंजीवादी देशों में नौकरशाही में भर्ती की स्थाई प्रक्रिया मौजूद है। इसके मुकाबले पेशेवर राजनीतिज्ञों का चुनाव पूंजीवादी व्यवस्था के कड़ी प्रतियोगिता के जरिए होता है। बहुत सारे व्यक्ति राजनीति के पेशे में अपनी किस्मत आजमाते हैं। उनमें से कुछ सफल होकर विभिन्न स्तरों के राजनीतिज्ञ बन जाते हैं। यह पेशेवर राजनीतिज्ञ एक तो अपनी सोच में खुद ही पूंजीवादी होते हैं लेकिन साथ ही पूंजीवादी व्यवस्था में तरक्की कर संपत्ति और शोहरत हासिल करना उनका उद्देश्य भी होता है। इसलिए चुनाव जीतकर वो वही करते हैं जो पूंजीपति वर्ग चाहता है।
जब वह चुनाव के समय जनता के मन की बातें करते हैं तो उसका वोट हासिल करने के लिए, पर जीत जाने के बाद वही करते हैं जो पूंजीपति वर्ग चाहता है। यह पूंजीवादी जनतंत्र की बेहद आम चीज है। इसी के द्वारा यह सुनिश्चित होता है कि वोट तो जनता देती है लेकिन शासन पूंजीपति वर्ग का चलता है। इस तरह राजनीतिज्ञों का भ्रष्टाचार पूंजीवादी जनतंत्र का अनिवार्य हिस्सा है। बल्कि यदि कोई पूंजीवादी राजनीतिज्ञ यह नहीं करता तो वह बेवकूफ है क्योंकि जनता को धोखा देकर पूंजीपति का शासन चलाने का काम तो उसे तब भी करना ही पड़ता है।
पूंजीवादी जनतंत्र में पूंजीपति वर्ग का शासन करने सुनिश्चित करने का एक दूसरा तरीका और भी प्रभावी है। यह तरीका है वास्तविक शासन को चुनी हुई संस्थाओं से अलग कर देना। पूंजीवादी जनतंत्र के हिसाब से शासन के तीन अंग विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका हैं। कार्यपालिका में समूची नौकरशाही और पुलिस आदि आती है। आमजन जिससे सरकार समझते हैं वह यही है और वास्तव में यही सरकार है। मजा देखिए कि यह चुने हुए लोगों से नहीं बल्कि स्थाई तौर पर नियुक्त लोगों से बनती है। पूंजीवादी जनतंत्र में वास्तविक शासन यही कार्यपालिका करती है। दिखाने के लिए पूंजीवादी जनतंत्र में संसद सर्वोपरि है पर यह पूंजीवादी शासन में मान्यता प्राप्त है कि शासन के सबसे महत्वपूर्ण मामले संसद के सामने नहीं रखे जाएंगे। एक उदाहरण पेश है।
भारत अमेरिका के बीच गुप्त समझौते पर संसद में कोई चर्चा नहीं हुई हालांकि संसद में इस पर बहुत हंगामा हुआ और कांग्रेस की सरकार 2008 में गिरते-गिरते बची थी। आज दुनिया की सारी संसद इसी तरह की निरर्थक बहस में अपना समय व्यतीत करती हैं, जबकि वास्तविक शासन मंत्री और नौकरशाह चलाते रहते हैं। इसलिए पूंजीवादी राजनीतिज्ञ आते-जाते रहते हैं जबकि पूंजीपति वर्ग का शासन बदस्तूर जारी रहता है। सत्तर साल से भारत में एक ही सरकार है वो है टाटा बिरला की या अंबानी अदानी की।
जब से पूंजीवाद एकाधिकार के दौर में पहुंचा है तब से इसकी प्रवृत्ति सभी क्षेत्रों में एकछत्र राज्य की रही है। ऐसे में चुनाव में पूंजी का खेल और पूंजी की पकड़ आधिक से अधिक बढ़ती गई है। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में तो बड़े-बड़े पूंजीपति अब स्वयं ही शासन में शामिल होने लगे हैं। ट्रंप इसका एक उदाहरण है। उन्हें परोक्ष रूप से शासन को नियंत्रित करने से संतोष नहीं है। इसी के अनुरूप दो चीज होती हैं। पूंजीपति वर्ग ने अपने प्रचार माध्यमों की विशाल ताकत से जनमानस को प्रभावित करने का काम किया है इसका परिणाम यह निकला है कि चुनाव में अधिक से अधिक फर्जी मुद्दे जैसे जाति, धर्म आदि प्रमुख मुद्दे बनते रहे हैं।
इससे मजदूर मेहनतकश जनता द्वारा चुनाव का प्रभावी इस्तेमाल करने की क्षमता घटती गई है। पूंजीवादी जनतंत्र में जमीनी स्तर के जनतंत्र या समावेशी जनतंत्र की बहुत बात होती है। भारत में एक ओर यह पंचायती राज के रूप में सामने आई है तो दूसरी और ह्यूगो चावेज़ के वेनेजुएला में मोहल्ला सभाओं के रूप में। केजरीवाल एंड कंपनी भी स्वराज के नाम पर इसकी बात करती है। असल में देखा जाए तो पूंजीवादी जनतंत्र जितना खोखला होता गया है, इसमें वास्तव में जन की भूमिका जितनी कम होती गई है उतनी ही पंचायती राज, जमीनी स्तर के लोकतंत्र का शोर सराबा बढ़ता गया है।
ग्राम या मोहल्ला स्तर पर कितना पैसा आएगा यह पूंजीपति वर्ग और उसकी नौकरशाही तय करती है, पर इसका इस्तेमाल कैसे होगा इसे तय करने में जनता को शामिल होने के लिए कहा जाता है। इस जमीनी स्तर के जनतंत्र में धोखे के सिवाय कुछ नहीं है। यदि इसमें कोई सार तत्व है तो बस इतना ही कि इसके जरिए पूंजीवादी शासन का जाल गांव और मोहल्ला तक पहुंच जाता है। इस बुनियादी स्तर तक पूंजीपति वर्ग के एजेंट तैयार हो जाते हैं। पूंजीवादी जनतंत्र का सबसे बड़ा अंतरविरोध यही है कि शासन के मामले में यह सबको औपचारिक बराबरी देता है जबकि लोग वास्तव में न केवल गैर बराबर हैं बल्कि उनके बीच गैर बराबरी लगातार बढ़ रही है।
यह कल्याणकारी राज्य के जमाने में भी बढ़ रही थी और आज के छुट्टे पूंजीवाद के जमाने में भी। एक और अति विशाल पूंजी के मालिक और दूसरी और उजरती गुलाम मजदूर यानि मजदूर। पूंजीवादी जनतंत्र एक लाख करोड़ रुपए के मालिक अंबानी और उनके यहां काम करने वाले मजदूर जिसके पास कोई संपत्ति नहीं है तथा जो जिंदा रहने के लिए काम मिलते रहने पर निर्भर है दोनों को शासन के मामले बराबर मानता है।
इसका परिणाम यह निकलता है कि वोट देने के बावजूद मजदूर लुटता-पिटता रहता है, जबकि वोट न देने के बावजूद अंबानी सरकार को अपने हिसाब से चलाता है। बल्कि उसका एक झटका ही सरकार को हिलाने के लिए काफी होता है। यह पूंजीवादी जनतंत्र किस हद तक पूंजीपति वर्ग का है इसके दो प्रमाण है। इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि मजदूर वर्ग चुनाव के जरिए अपना राज और अपनी समाज व्यवस्था समाजवाद कायम करने में कामयाब हुआ है।
अभी तक जितने भी मजदूर राज कायम हुए हैं वे सारे ही क्रांति के जरिए ही हुए हैं। पूंजीपति वर्ग हमेशा ही मजदूर वर्ग को चुनौती देता रहा है कि आओ और चुनाव जीतकर अपना समाज बना लो। मजदूर वर्ग की जो पार्टियां इसे स्वीकार कर आगे बढ़ीं वह सारी ही पतित होकर पूंजीवादी व्यवस्था में समाहित हो गईं। भले ही उन्होंने अपना नाम ना बदला हो।
अच्छा, इसका उल्टा भी हुआ है। जब भी पूंजीपतियों को लगा कि चुनाव के जरिए कुछ ऐसे लोग सत्ता में आगे हैं जो उसकी व्यवस्था को खतरा हैं तो उसने तुरंत ही अपना पूंजीवादी जनतंत्र का चोला त्याग दिया। यहां तक कि इसकी आशंका तक होने पर भी उसने ऐसा ही किया। 1973 में चिली में अलेंदे सरकार का तख्तापलट और 1965 में इंडोनेशिया में लाखों कम्युनिस्टों का कत्ल ए आम इसके दो प्रतिनिधिक उदाहरण हैं।
अपनी पूंजीवादी व्यवस्था को कोई वास्तविक खतरा पैदा होते ही पूंजीपति वर्ग जनतंत्र के नकाब को किनारे रख देता है और अपना वास्तविक खूंखार चेहरा सामने लाता है। अक्सर इसे सैनिक तानाशाही के रूप में देखते हैं। इसके जरिए वह एक बार फिर प्रमाणित करता है कि पूंजीवाद में वास्तविक शासन नौकरशाही और सेना पुलिस ही है।
इसके साथ ही लेनिन का 11 जुलाई 1919 का राज्य के बारे में स्वरदेलेव विश्वविद्यालय में दिया गया लेक्चर भी ऐतिहासिक है। इस भाषण का अंत महागुरु लेनिन लगभग, करीब-करीब कुछ इस प्रकार करते हैं:
“कोई लोकतंत्र चाहे जितना भी लोकतांत्रिक होने का दावा करे यदि वह एक पूंजीवादी जनतंत्र है, यदि उसमें (विशाल) भूखंड और फैक्ट्रियां निजी संपत्ति हैं, यदि वह विशाल बहुसंख्या को पूंजी के गुलाम उजरती मजदूरों के रूप में रखता है, तो वह राज्य एक (अति) अल्पसंख्या द्वारा बहुसंख्यक जनता को कुचलने की मशीन मात्र है। और हम इस मशीन को उठाकर उस वर्ग के हाथ में दे देंगे जिसे इस पूंजीपति वर्ग की सत्ता को उलटना है। हम राज्य (या सरकार) के बारे में ‘सार्वजनिक बराबरी’ के भ्रम के पर्दे को फाड़ डालेंगे। क्योंकि यह धोखा है। जब तक शोषण है, तब तक कोई समानता नहीं हो सकती। एक मजदूर जमींदार के बराबर नहीं हो सकता, भूख से पीड़ित एक मनुष्य कभी भी (मेवा, मालपुए) खाए-अघाए व्यक्ति के बराबर नहीं हो सकता।
(रूस में) हमने इस मशीन को पूंजीपति वर्ग के हाथ से छीन कर मजदूर वर्ग के हाथ में दे दिया है और इसके द्वारा हम शोषण के तमाम रूपों को समाप्त करेंगे और जब शोषण के फिर से सर उठाने की कोई संभावना नहीं रह जाएगी, हम इस मशीन को उठाकर वस्तुओं के अजायबघर में लाकर रख देंगे जहां कहां से काँसे की कुल्हाड़ी आदि सामान रखे हैं।
यानि तब किसी भी प्रकार की राज्य सत्ता (या सरकार) का अस्तित्व न रहेगा।
(लेनिन कह रहे हैं वह है कुछ मात्रा में कबीलाई आदिम कम्युनिज्म लेकिन उससे कहीं बहुत आगे का कम्युनिस्ट समाज! ) यह है हमारी कम्युनिस्ट पार्टी का दृष्टिकोण!”
(डॉ. उमेशचंदोला का लेख)